पालोना झारखंड पुलिस व उन सभी महिला पुलिस अधिकारियों को सेल्यूट करता है, जिन्होंने शिशु हत्या के खिलाफ लड़ाई लड़ने के लिए मोर्चा संभालना शुरू कर दिया है। ऐसा करके झारखंड अपने पड़ोसी राज्यों बिहार, उड़ीसा और उत्तरप्रदेश से आगे निकल गया है।
बीपीआरएंडडी यानी ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट, नई दिल्ली के तत्वावधान में महिलाओं की सुरक्षा विषय पर अनुसंधान प्रशिक्षण विद्यालय, होटवार, रांची में पांच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। 02 मार्च से 06 मार्च तक आयोजित इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में झारखँड राज्य की सहायक अवर निरीक्षक से पुलिस निरीक्षक स्तर तक की पदाधिकारियों को महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर प्रशिक्षण दिया गया।
इस कार्यक्रम के दौरान पालोना अभियान की फाउंडर व पत्रकार मोनिका आर्य ने शिशु हत्या और उनके असुरक्षित परित्याग के विभिन्न पक्षों पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि कई राज्यों में शिशु हत्या के मामले दर्ज ही नहीं हो रहे हैं। ऐसे राज्यों में बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे प्रदेश शामिल हैं।
केस दर्ज नहीं होने के प्रमुख कारणों में उन्होंने इस मुद्दे व कानूनी प्रावधानों के प्रति जानकारी का अभाव, रिसोर्सेज की कमी, काम का अतिरिक्त बोझ और कार्य में शिथिलता व संवेदनाओं की कमी को माना।
उन्होंने बताया कि झारखँड में भी पहले यही स्थिति थी, लेकिन पुलिस अधिकारियों को दी जा रही ट्रेनिंग के बहुत सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं और इनका वास्तविक लाभ आने वाले समय में नजर आएगा। उन्होंने कहा कि जानकारी का अभाव दूर करने के लिए ही पालोना अभियान के तहत शिशु हत्या के मुद्दे पर उन्हें ट्रेनिंग दी जा रही है। रिसोर्सेज की कमी को कैसे दूर किया जाए, इस पर मंथन जारी है और संवेदनाएं पुलिस अधिकारियों को स्वयं पैदा करनी होंगी। और यह कार्य उन्हें करना ही होगा, क्योंकि न्याय के लिए इन बच्चों की आखिरी उम्मीद पुलिस ही हैं।
आर्य ने इन मामलों में लगने वाले आईपीसी के विभिन्न सेक्शन्स की जानकारी दी और जेजेएक्ट द्वारा उत्पन्न कन्फ्यूजन को भी दूर किया। उन्होंने विभिन्न केस स्टडीज पर चर्चा की और इन मामलों की जांच के दौरान ध्यान रखने वाली बातों की भी जानकारी दी-