13 SEPTEMBER 2020
BANGLORE, KARNATAKA (F, D)
क्या हुआ -
बनशंकरी में रहने वाले शिव कुमार जब उस दिन मॉर्निंग वॉक के लिए निकले, तो उन्हें एक सफाईकर्मी ने आवाज दी। वह एक दीवार के पास पड़े कूड़े के ढेर को साफ कर रहीं थीं कि उन्हें उस ढेर में एक नन्ही सी बच्ची नजर आई।
यह बच्ची बहुत घायल थी। उसकी दायीं आखं की पलक को लैसर बैंडीकूट रैट ( एक प्रकार का चूहा, जिसे ऐशियाई देशों में नवजात बच्चों के जीवन के लिए खतरा समझा जाता है) ने बुरी तरह जख्मी कर दिया था। वह बच्ची किसी भी तरह की प्रतिक्रिया
नहीं दे रही थी। वह इतना कमजोर और दर्द में थी कि रो भी नहीं पा रही थी। मगर जीवन उसमें अभी भी बाकी था। उसकी सांसें धीरे-धीरे चल रहीं थीं और यही वह बात थी, जिसने श्री कुमार को जीवन की उम्मीद से भर दिया था।
यह घटना मंगलवार को सीके अचूकट्टू के जनता बाजार सिग्नल पर फ्लाईओवर के नजदीक घटी। उस वक्त मार्केटिंग मैनेजर श्री कुमार मॉर्निंग वॉक के लिए निकले थे। उन्हें फुटपाथ पर कूड़े के ढेर को साफ कर रही सफाईकर्मी ने
आवाज देकर बुलाया। जब श्री कुमार ने उस बच्ची को देखा, तो उसके पूरे शरीर पर कूड़ा करकट लगा हुआ था और दायीं आंख से खून बह रहा था।
पा-लो ना को इस घटना की सूचना महाराष्ट्र की संस्था व्हेयर आर इंडिया'ज चिल्ड्रन (WAIC) की को-फाउंडर श्रीमती मीरा मारती ने दी थी। उन्होंने पा-लो ना के महाराष्ट्र ग्रुप में बंगलौर मिरर का एक न्यूजलिंक शेयर किया था,
जिसमें इस घटना को डिटेल में लिखा गया था। इस खबर को पढ़ने के तुरंत बाद बंगलौर के एक सीनियर रिपोर्टर से पा-लो ना ने संपर्क किया और श्री कुमार का नंबर अरेंज कर उनसे बात करने का प्रयास किया।
खबर के मुताबिक, श्री कुमार बच्ची को लेकर तुरंत पास के ही एक निजी अस्पताल पहुंचे थे, लेकिन अस्पताल ने यह कहकर उन्हें वापिस भेज दिया कि वे बच्ची को साफ करके लेकर आएं। अस्पताल द्वारा कोविड प्रोटोकॉल और स्टाफ
की कमी को इसका कारण बताया गया। कुमार उसे लेकर अपने घर लौट आए। उसे गर्म पानी से साफ किया और फिर उन कपड़ों में लपेट दिया, जो उन्होंने अपने बच्चे के लिए खरीदे थे। असल में कुमार की पत्नी गर्भवती हैं और आने वाले बच्चे के
लिए उन्होंने कुछ शॉपिंग की थी।
कुमार के पड़ोसियों ने उन्हें बच्ची को चम्मच से दूध पिलाने की सलाह दी। कुमार ने ऐसा ही किया। बच्ची ने बमुश्किल दो चम्मच दूध पिया होगा। इसके बाद कुमार ने पुलिस को सूचना दी, जिस पर पुलिस ने बच्ची को गिरीनगर के राधाकृष्णा
अस्पताल लाने को कहा। वहां जाते ही बच्ची को आईसीयू ले जाया गया, मगर आधे घंटे के अंदर ही बच्ची ने दम तोड़ दिया।
पा-लो ना ने इस संबंध में श्री कुमार से बातचीत करने की कोशिश की तो उन्होंने यह कहकर बात करने से इनकार कर दिया कि वह पहले ही सबकुछ पुलिस और मीडिया को बता चुके हैं। और इसे फिर से याद नहीं करना चाहते। वह काफी नाराज
नजर आ रहे थे।
पा-लो ना का पक्ष -
हम कुमार की व्यथा को समझ सकते हैं। एक व्यक्ति, जो अपने बच्चे के दुनिया में आने का बेसब्री से इंतजार कर रहा हो, उसे एक गंभीर रूप से घायल बच्ची कूड़े के ढेर में मिलती है, वो उसे बचाने का हर संभव प्रयास करता है, लेकिन
व्यवस्था के हाथों हार जाता है।
इस दर्द, इस टीस को किसी व्यवस्था के वे नुमाइंदे कभी नहीं समझ सकते, जिन्होंने संवेदनशीलता के सभी दरवाजों को मजबूती से बंद कर दिया है। निजी अस्पतालों की बड़ी बड़ी इमारतें भी ऐसी ही व्यवस्था के क्रूर धरातल पर खड़ी
की जाती हैं, जिनके लिए दर्द, इंसानियत, सहयोग जैसे शब्दों का कोई मोल नहीं होता।
वह निजी अस्पताल यदि बच्ची को लौटाने की बजाय उसे एडमिट कर उसी समय उसका इलाज शुरू कर देता, तो शायद बच्ची बच जाती। इसके लिए कम से कम एक प्रयास तो वह भी कर सकता था, मगर उसने ऐसा नहीं किया।
शिशु परित्याग के अधिकांश मामलों में बच्चे अक्सर इसी वजह से नहीं बच पाते, कि जो क्रूशियल समय उनके इलाज पर लगना चाहिए, वह उन्हें इधर से उधर करने में जाया हो जाता है।
पा-लो ना अमानवीय कंडीशंस में मिले इन बच्चों के लिए त्वरित और श्रेष्ठ इलाज की हमेशा वकालत करता है। यही वह पहला तरीका है, जिससे इन अबेंडन मिले बच्चों के मोर्टेलिटी रेट को कम कर सर्वाईवल रेट को बढ़ाया जा सकता है।
इसके अलावा इस अपराध को रोकने के लिए सख्त कानून बनाने होंगे। सरकार को सोचना होगा कि जब हम भ्रूण की सुरक्षा के लिए सख्त कानून बना सकते हैं तो नवजात शिशु की रक्षा के लिए क्यों नहीं।
बच्चों को असुरक्षित छोड़ने को उनकी हत्या के प्रयासों के रूप में दर्ज करना होगा। और इलाज के पूर्व, दौरान या बाद में इन अबेंडन बच्चों की मौत को उनकी हत्या के रूप में लेना होगा।
बच्चों को असुरक्षित छोड़ने के कानूनी खतरे लोगों को बताने होंगे।
इस अपराध के सजा के प्रावधानों के साथ-साथ सेफ सरेंडर पर जन जन को जागरुक करना होगा। इसके लिए मास अवेयरनैस करनी होगी।
