निशांत गौतम
02 September 2020
Hardoi, UP (F, A)
क्या हुआ -
सुबह का समय था। यही कोई आठ-साढ़े आठ बज रहे थे। उसी समय कुछ लोग जब अपने खेतों की तरफ जा रहे थे तो राखदेवी मंदिर के पास से गुजरने पर उन्हें एक बच्चे के रोने की आवाज सुनाई दी। ढूंढने पर उन्होंने पाया कि एक नवजात बच्ची
कपड़े में लिपटी झाड़ियों के किनारे में जमीन पर रखी हुई है। उसकी नाभि पर क्लिप भी लगा हुआ है और उसके आस-पास कोई नहीं है।
यह घटना उत्तर प्रदेश के हरदोई कानपुर हाईवे पर स्थित कस्बा माधौगंज की है। बच्ची को देखकर ऐसा लगता था, मानो जानबूझकर उसे वहां रखा गया है, ताकि किसी की नजर उस पर पड़ जाए और वह उसे उठा ले।
लोगों ने बच्ची के मिलने की खबर तुरंत थाना माधौगंज को दी। थाना प्रभारी ने हरदोई चाइल्ड लाइन से संपर्क स्थापित किया और बच्ची को अपनी कस्टडी में लेकर तत्काल राजकीय अस्पताल पहुंचाया।
सरकारी व अन्य पक्ष -
"यह बच्ची एक ऐसे प्राचीन मंदिर के पीछे मिली है, जो प्रायः बंद ही रहता है। उसके पीछे एक तालाब है। बच्ची को उसी मंदिर के पीछे उस रास्ते पर किनारे में रखा गया था, जो गांव को जाता है। प्रत्यक्षदर्शियों
का कहना है कि बच्ची को वहां रखे 15-20 मिनट से ज्यादा नहीं हुआ होगा। बच्ची को वहां रखने वाला उसे नुकसान नहीं पहुंचाना चाहता था, ऐसा लगता है। वरना वह उसे तालाब में भी डाल सकता था। बच्ची पूरी तरह स्वस्थ है। और जल्द ही
उसे स्पेशल एडॉप्शन एजेंसी (सा) भेज दिया जाएगा।" -
श्री शिशिर गौतम, बाल कल्याण समिति, हरदोई
"बच्ची अभी मात्र 1 या 2 दिन की ही है। ऐसा लगता है कि उसका जन्म किसी अस्पताल में हुआ है। उसके शरीर पर कहीं भी कोई गंभीर चोट नहीं है और न ही किसी कीड़े या चींटी के काटने का कोई निशान है।"
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डॉ अविनाश वर्मा, बच्ची का इलाज करने वाले डॉक्टर
पा-लो ना का पक्ष -
पा-लो ना उन सभी लोगों के प्रति कृतज्ञ है, जिनकी इस शिशु को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। सीडब्लूसी हरदोई की बात विचारणीय है कि बच्ची को त्यागने वाले बच्ची को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहते थे, लेकिन वे अनजाने
में ही इसके हत्यारे बन सकते थे। यदि इंसानों से पहले कोई जानवर बच्ची तक पहुंच जाता तो उसे बचाना मुश्किल था। इस घटना ने एक बार फिर यह एहसास करवाया है कि -
सरकार की सेफ सरेंडर पॉलिसी के बारे में ज्यादा से ज्यादा प्रचार प्रसार होना जरूरी है।
यदि उस क्षेत्र में पालने लगाए जाते और उनका व्यापक प्रचार होता, तब शायद बच्चा रास्ते में नहीं, बल्कि पालने में मिलता।
चाईल्डलाइन के साथ साथ स्थानीय बाल संरक्षण पदाधिकारियों की जानकारी सभी आंगनबाड़ी केंद्रों, जच्चा बच्चा केंद्रों के साथ साथ सभी अस्पतालों में भी डिस्प्ले होनी चाहिए।