21 जून 2018 बंगलौर, कर्नाटक (F)
क्या ऐसा संभव है कि किसी की नींद अन्य के लिए मौत का पैगाम साबित हो। क्या ये भी संभव है कि किसी की जिंदगी अन्य के जागने पर टिकी हो। संभव और असंभव के मध्य में एक घटना बंगलौर में उस गुरुवार घटी, जिसने इन प्रश्नों को जन्म दिया। ये वही घटना थी, जिसमें दरवाजे पर पड़ी महज दो घंटे की ज़िंदगी सुधा के जागने पर ही टिकी थी। सीनियर जर्नलिस्ट श्री नेहाल अहमद ने पा-लो ना को बताया कि सुधा वसन बंगलुरु के रमैय्या में रहती हैं। सुबह चार बजे जब किसी के रोने की आवाज़ सुनाई दी तो उन्हें लगा शायद कोई बिल्ली है। मगर एक घंटे बाद जब दुबारा उनकी नींद खुली तो उन्हें आभास हुआ कि ये बिल्ली की आवाज़ नहीं। वह अपने 22 साल के बेटे श्रीजीत को लेकर बाहर निकली। बाहर घनघोर अंधेरा था इसलिए उन्होने इमरजेंसी लाइट ले रखी थी। बाहर निकलते ही जिस पर उनकी निगाह सबसे पहले पड़ी, वह थी, उनके दरवाजे पर प्लास्टिक कवर और पतले से तौलिए में लिपटी एक नवजात बच्ची, जो जोर जोर से रो रही थी। उसकी नाल तक नहीं काटी गई थी। सुधा ने पड़ोसियों को जगाया और बनसवाड़ी पुलिस को इसकी सूचना दी। तब तक उन्होंने अपने कपड़े में उसे लपेटकर रखा। पुलिस बच्ची को निकटवर्ती अस्पताल लेकर गई, लेकिन वहां बच्चों के इलाज की कोई व्यवस्था नही थी। फिर नवजात बच्ची को ओवम हॉस्पिटल ले जाया गया। डॉक्टर्स ने बताया कि बच्ची की हार्ट बीट ठीक है, मगर उसे ठंड लग गई है। इसलिए उसे इनक्यूबेटर में रखा गया। वहीं ये जानकारी भी दी गई कि बच्ची महज दो घंटे की रही होगी, जब उसे फेंक दिया गया। सुबह 8 बजकर 30 मिनट पर सुधा ने प्राथमिकी दर्ज कराई और पुलिस ने धारा 317 के तहत मामला दर्ज कर लिया। चाइल्ड प्रोटेक्शन कमीशन को इसकी सूचना दे दी गई। बच्ची के स्वस्थ होने के बाद उसे निमहन्स के नजदीक स्थित शिशु विहार में भेज दिया जाएगा। टीम पा-लो ना को लगता है कि बच्ची को उस घर के दरवाजे पर रखने वाले निश्चित तौर पर घर के लोगों से परिचित रहे होंगे और इस बात को लेकर आश्वस्त होंगे कि वहां उनकी बच्ची पूरी तरह सुरक्षित रहेगी। उनका विश्वास गलत भी नहीं था। बच्ची को बचा लिया गया।
