22 SEP 2O18 शिशु हत्या के खिलाफ नाकेबंदी शुरू.... LOHARDAGA, JHARKHAND करीब छह साल की रही होंगी। सोकर उठी और मम्मी को ढूंढते हुए आंगन में आई तो वहां बहुत सारे मकौड़े (चींटे) थे, मोटे-मोटे, काले-काले। उनमें से तीन-चार मेरे पैर पर चढ़ गए। पैर झटक कर बाकी तो हटा दिए मैंने, लेकिन एक मकौड़ा मेरे पैर की दो अंगुलियों में बुरी तरह चिपट गया और काटने लगा। मैं जितना पैर झटकती, वह उतना अपना डंक और गहरा कर देता। वहां से खून निकलने लगा। मैं दर्द से परेशान और घर में कोई नहीं। रोते-रोते ही बाहर निकली, पड़ौस में ही मम्मी थी, वहां पहुंची, तब जाकर उस मकौड़े से मुक्ति मिली। मकौड़ा मर गया, लेकिन मेरा पैर नहीं छोड़ा। घाव करके माना। उसके भी एक-एक अंग को अलग करके पैर से उसे हटाना पड़ा था।लोहरदगा के इस बच्चे की तस्वीर पर नजर पड़ी तो साढ़े तीन दशक पुरानी वो घटना जीवंत हो गई। कितने ही चींटे शरीर पर चलते महसूस हुए। मकौड़े के काटने का दर्द हो सकता है, बहुत ज्यादा न होता हो, लेकिन छह साल की एक बच्ची को वह बहुत लगा था कि आज भी उसे याद कर झुरझुरी दौड़ जाती है।ये बच्चा तो छह घंटे का भी नहीं था और उस पर मकौड़ों की पूरी फौज टूट पड़ी थी। उसे एक गत्ते के डिब्बे में और डिब्बे को एक सफेद झोले में रखकर श्मशान घाट के पास ढलान पर शायद ऊपर से ही फेंका गया था, जिससे डब्बा लुढ़ककर झोले से बाहर आ गया था और उसमें से बच्चा भी बाहर गिर गया था। खून में सने उस मासूम की गंध ने चींटों को आकृष्ट कर लिया। एक नन्हा सा प्रीमेच्योर बच्चा, मात्र आधा किलो वजन था जिसका, कुछ नहीं कर पाया। रोया होगा तो आवाज नहीं निकली होगी गले से। अगर निकलती तो कोई तो सुनता। कितने डंक चुभे, कहां कोई गिन सका।अब इतने छोटे बच्चे का पोस्टमार्टम कैसे हो, कभी किसी ने किया नहीं था वहां। लेकिन केस दर्ज करवाने के लिए तो ये जरूरी था। लोहरदगा एसपी और सदर थाने को सूचना दे दी और केस दर्ज भी हो गया। पोस्टमार्टम के बाद अंतिम क्रिया भी ठीक से हो जाए, यह भी आग्रह कर दिया और विश्वास भी मिला कि सब तरीके से ही हो जाएगा।केस दर्ज होना इस अपराध की नाकेबंदी के लिए पहला चरण है और ये बताते हुए बहुत सुकून मिल रहा है कि झारखंड पुलिस शिशु परित्याग और हत्या के मामलों में सक्रिय हुई है। अगस्त और सितंबर में पालोना के दखल के बाद रांची और लोहरदगा में कुल 5 मामलों में केस दर्ज हुए हैं। आर्य मोनिका